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टेंडर में फर्जीवाड़े पर बिहार सरकार का बड़ा एक्शन, 5 निर्माण कंपनियां 10 साल के लिए ब्लैकलिस्ट

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बिहार के ग्रामीण कार्य विभाग ने टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप में 5 निर्माण कंपनियों को 10 वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है। विभाग ने इसे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की बड़ी कार्रवाई बताया है।

पटना/आलम की खबर:बिहार में सरकारी टेंडर प्रक्रिया को पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की दिशा में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए ग्रामीण कार्य विभाग ने पांच निर्माण कंपनियों को 10 वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है। विभागीय जांच में इन कंपनियों पर टेंडर प्राप्त करने के लिए जाली अनुभव प्रमाण पत्र, भ्रामक दस्तावेज और गलत जानकारी प्रस्तुत करने के आरोप सही पाए गए। सरकार के इस कदम को राज्य में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्रवाई माना जा रहा है।

ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा की गई इस कार्रवाई ने निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों के बीच हलचल पैदा कर दी है। विभाग का कहना है कि सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों में किसी भी प्रकार की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विशेष रूप से सड़क, पुल और ग्रामीण बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में यदि कोई एजेंसी गलत जानकारी देकर अनुबंध प्राप्त करने का प्रयास करती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

जानकारी के अनुसार विभाग को टेंडर प्रक्रिया के दौरान कुछ कंपनियों द्वारा प्रस्तुत किए गए अनुभव प्रमाण पत्रों और अन्य दस्तावेजों को लेकर शिकायतें मिली थीं। इसके बाद संबंधित दस्तावेजों की विस्तृत जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि कई एजेंसियों ने अपनी योग्यता और अनुभव को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया था, जबकि कुछ मामलों में दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद विभाग ने संबंधित कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया और उनसे स्पष्टीकरण मांगा।

जांच प्रक्रिया के दौरान संबंधित कंपनियों ने अपने बचाव में कई तरह के तर्क दिए। कुछ एजेंसियों ने दावा किया कि दस्तावेज जमा करने में तकनीकी त्रुटि हुई थी, जबकि कुछ ने बीमारी या प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया। एक कंपनी ने तो गलत दस्तावेज अपलोड होने की जिम्मेदारी कंप्यूटर ऑपरेटर पर डालने का प्रयास किया। हालांकि विभाग ने इन दलीलों को संतोषजनक नहीं माना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करने का निर्णय लिया।

बताया जाता है कि सीवान और वैशाली जिले से जुड़ी निर्माण एजेंसियों के खिलाफ सबसे पहले गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। जांच अधिकारियों ने पाया कि इन कंपनियों द्वारा प्रस्तुत किए गए अनुभव प्रमाण पत्रों में कई विसंगतियां थीं। सत्यापन के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि दस्तावेजों में दी गई जानकारी वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती। इसके बाद विभाग ने इन एजेंसियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का रास्ता अपनाया।

भागलपुर और कटिहार जिले से संबंधित निर्माण कंपनियों के मामले में भी जांच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अधिकारियों ने पाया कि टेंडर प्रक्रिया में जमा किए गए कुछ दस्तावेज प्रमाणित रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते थे। विभागीय जांच टीम ने जब संबंधित अभिलेखों का सत्यापन कराया तो दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। इसके बाद इन एजेंसियों को भी ब्लैकलिस्ट करने का फैसला लिया गया।

केवल फर्जी दस्तावेज ही नहीं बल्कि कार्य निष्पादन में लापरवाही को भी विभाग ने गंभीरता से लिया है। सारण और पूर्णिया जिले से जुड़ी कुछ एजेंसियों पर अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं करने, समय पर कार्य पूरा नहीं करने और आवश्यक परफॉर्मेंस सिक्योरिटी जमा नहीं करने के आरोप लगे थे। विभाग का मानना है कि विकास योजनाओं में देरी और गुणवत्ता में कमी का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, इसलिए ऐसी लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ग्रामीण कार्य विभाग की इस कार्रवाई को राज्य सरकार की उस नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बिहार सरकार ने ई-टेंडरिंग प्रणाली को मजबूत करने, ऑनलाइन निगरानी बढ़ाने और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया है। इसके बावजूद यदि कोई एजेंसी नियमों को दरकिनार कर अनुचित लाभ लेने की कोशिश करती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी परियोजनाओं में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए केवल तकनीकी मानकों का पालन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया की शुचिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई एजेंसी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अनुबंध हासिल कर लेती है तो इससे न केवल प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ जाती है। ऐसे में विभाग द्वारा की गई यह कार्रवाई एक मजबूत संदेश देती है कि नियमों के उल्लंघन पर किसी भी एजेंसी को बख्शा नहीं जाएगा।

निर्माण क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई का सीधा प्रभाव संबंधित कंपनियों के भविष्य पर पड़ेगा। 10 वर्षों तक प्रतिबंधित रहने के कारण ये एजेंसियां राज्य सरकार की परियोजनाओं में भाग नहीं ले सकेंगी। इससे अन्य निर्माण कंपनियों को भी नियमों का पालन करने और दस्तावेजों की सत्यता बनाए रखने के लिए प्रेरणा मिलेगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल, संपर्क मार्ग और अन्य आधारभूत संरचना परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा निजी निर्माण एजेंसियों के माध्यम से पूरा किया जाता है। ऐसे में सरकार चाहती है कि केवल योग्य और विश्वसनीय एजेंसियों को ही काम मिले। विभाग का मानना है कि पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया से न केवल परियोजनाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ भी समय पर लोगों तक पहुंचेगा।

सरकार की इस कार्रवाई के बाद निर्माण क्षेत्र में जवाबदेही और सतर्कता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। विभाग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि भविष्य में भी टेंडर प्रक्रिया की लगातार निगरानी की जाएगी और किसी भी स्तर पर गड़बड़ी पाए जाने पर तुरंत कार्रवाई होगी। अधिकारियों का कहना है कि विकास कार्यों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

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